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बहुला चतुर्थी विशेषाङ्क

ज्योतिर्विद डी डी शास्त्री
सुरूपा बहुरूपाश्च विश्वरूपाश्च मातरः।
गावो मामुपतिष्ठन्तामिति नित्यं प्रकीर्तयेत्॥

जय माता दी.. भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को बहुला चौथ या बहुला चतुर्थी के नाम से जाना जाता है.इस बार यह बहुत खास दिन बुधवार यानी यह श्री गणेश जी प्रिय दिन पड़ रही है. अतः इस बार व्रत पूजा करने वाले लोगों को इससे विशेष लाभ मिलेंगे. इस साल यह व्रत बुधवार, 25 अगस्त को है. मान्यताओं के मुताबिक बहुला चतुर्थी का व्रत रखने वाली महिलाओं की संतान के ऊपर आने वाले कष्ट मिट जाते हैं.!

भगवान श्री गणेश को चतुर्थी तिथि का स्वामी कहा गया है. भाद्रपद चतुर्थी तिथि को पुत्रवती स्त्रियां अपने संतान की रक्षा के लिए व्रत रखती हैं. इस दिन चन्द्रमा के उदय होने तक बहुला चतुर्थी का व्रत करने का बहुत ही महत्व है. वस्तुतः इस व्रत में गौ तथा शेर की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर पूजा करने का विधान प्रचलित है. इस व्रत को गौ पूजा व्रत भी कहा जाता है.!


-:'बहुला चतुर्थी व्रत की प्रचलित कथा':-
बहुला चतुर्थी व्रत से संबंधित एक बड़ी ही रोचक कथा प्रचलित है.जब भगवान विष्णु का कृष्ण रूप में अवतार हुआ, तब इनकी लीला में शामिल होने के लिए देवी-देवताओं ने भी गोप-गोपियों का रूप लेकर अवतार लिया. कामधेनु नाम की गाय के मन में भी कृष्ण की सेवा का विचार आया और अपने अंश से बहुला नाम की गाय बनकर नंद बाबा की गौशाला में आ गई.!

भगवान श्रीकृष्ण का बहुला गाय से बड़ा स्नेह था. एक बार श्रीकृष्ण के मन में बहुला की परीक्षा लेने का विचार आया. जब बहुला वन में चर रही थी तभी भगवान श्रीकृष्ण सिंह रूप में प्रकट हो गए. मौत बनकर सामने खड़े सिंह को देखकर बहुला भयभीत हो गई. लेकिन हिम्मत करके सिंह से बोली, 'हे वनराज मेरा बछड़ा भूखा है. बछड़े को दूध पिलाकर मैं आपका आहार बनने वापस आ जाऊंगी.!

सिंह ने कहा कि सामने आए आहार को कैसे जाने दूं, तुम वापस नहीं आई तो मैं भूखा ही रह जाऊंगा. बहुला ने सत्य और धर्म की शपथ लेकर कहा कि मैं अवश्य वापस आऊंगी. बहुला की शपथ से प्रभावित होकर सिंह बने श्रीकृष्ण ने बहुला को जाने दिया. बहुला अपने बछड़े को दूध पिलाकर वापस वन में आ गई.!

बहुला की सत्यनिष्ठा देखकर श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए और अपने वास्तविक स्वरूप में आकर कहा कि 'हे बहुला, तुम परीक्षा में सफल हुई. अब से भाद्रपद चतुर्थी के दिन गौ-माता के रूप में तुम्हारी पूजा होगी. तुम्हारी पूजा करने वाले को धन और संतान का सुख मिलेगा.!

-:'श्रीगणेश अवतरण कथा':-
शिवपुराण के अनुसार भगवान गणेश जी के जन्म लेने की कथा का वर्णन प्राप्त होता है. जिसके अनुसार देवी पार्वती जब स्नान करने से पूर्व अपनी मैल से एक बालक का निर्माण करती हैं और उसे अपना द्वारपाल बनाती हैं. वह उनसे कहती हैं 'हे पुत्र तुम द्वार पर पहरा दो मैं भीतर जाकर स्नान कर रही हूं. अत: जब तक मैं स्नान न कर लूं, तब तक तुम किसी भी पुरुष को भीतर नहीं आने देना.!

जब भगवान शिव आए तो गणेश जी ने उन्हें द्वार पर रोक लिया और उन्हें भीतर नहीं जाने दिया. इससे शिवजी बहुत क्रोधित हुए और बालक गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया. अपने पुत्र का सिर धड़ से अलग हुए देख माता पार्वती दुखी और क्रोधित हो उठीं. अत: उनके दुख को दूर करने के लिए भगवान शिव के निर्देश अनुसार उनके गण उत्तर दिशा में सबसे पहले मिले जीव (हाथी) का सिर काटकर ले आते हैं और शिव भगवान ने गज के उस मस्तक को बालक के धड़ पर रखकर उसे पुनर्जीवित कर देते हैं.!

पार्वती जी हर्षातिरेक हो कर पुत्र गणेश को हृदय से लगा लेती हैं तथा उन्हें सभी देवताओं में अग्रणी होने का आशीर्वाद देती हैं. ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने उस बालक को सर्वाध्यक्ष घोषित करके अग्रपूज्य होने का वरदान दिया. चतुर्थी को व्रत करने वाले के सभी विघ्न दूर हो जाते हैं सिद्धियां प्राप्त होती हैं.!

घृतक्षीरप्रदा गावो घृतयोन्यो घृतोद्भवाः।
घृतनद्यो घृतावर्तास्ता मे सन्तु सदा गृहे॥
घृतं मे हृदये नित्यं घृतं नाभ्यां प्रतिष्ठितम्।
घृतं सर्वेषु गात्रेषु घृतं मे मनसि स्थितम्॥
गावो ममाग्रतो नित्यं गावः पृष्ठत एव च।
गावो मे सर्वतश्चैव गवां मध्ये वसाम्यहम्॥
यया सर्वमिदं व्याप्तं जगत् स्थावरजङ्गमम्।
तां धेनुं शिरसा वन्दे भूतभव्यस्य मातरम्॥

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